कुछ दिनों पूर्व “तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कड़गम” (TTMK) (नाम सुना है कभी???) केएक नेता एम एच जवाहिरुल्ला ने एक जनसभा में फ़रमाया कि “औरंगजेब के खिलाफ़सबसे बड़ा आरोप है कि उसने काशी विश्वनाथ का मन्दिर ध्वस्त किया था, हालांकि यहसच है, लेकिन उसने ऐसा क्यों किया था यह भी जानना जरूरी है” उसके बाद उन्होंने स्वबीएन पांडे की एक पुस्तक का हवाला दिया और प्रेस को बताया कि असल में औरंगजेबके एक वफ़ादार राजपूत राजा की रानी का विश्वनाथ मन्दिर में अपमान हुआ और उनकेसाथ मन्दिर में लूट की घटना हुई थी, इसलिये औरंगजेब ने मन्दिर की पवित्रता बनायेरखने के लिये(???) काशी विश्वनाथ को ढहा दिया था”… (हुई न आपके ज्ञान मेंबढ़ोतरी)। एक कट्टर धार्मिक बादशाह, जो अपने अत्याचारों और धर्म परिवर्तन केलिये कुख्यात था, जिनके खानदान में दारुकुट्टे और हरमों की परम्परा वाले औरतबाजलोग थे, वह एक रानी की इज्जत के लिये इतना चिंतित हो गया? वो भी हिन्दू रानी औरहिन्दू मन्दिर के लिये कि उसने “सम्मान” की खातिर काशी विश्वनाथ का मन्दिर ढहादिया? कोई विश्वास कर सकता है भला? लेकिन इस प्रकार की “सेकुलर”(?) कहानियाँसुनाने में वामपंथी लोग बड़े उस्ताद हैं।
जब अयोध्या आंदोलन अपने चरम पर था, उस वक्त विश्व हिन्दू परिषद ने अपने अगलेलक्ष्य तय कर लिये थे कि अब काशी और मथुरा की बारी होगी। हालांकि बाद में बनारसके व्यापारी समुदाय द्वारा अन्दरूनी विरोध (आंदोलन से धंधे को होने वाले नुकसान केआकलन के कारण) को देखते हुए परिषद ने वह “आईडिया” फ़िलहाल छोड़ दिया है।लेकिन उसी समय से “सेकुलर” और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने काशी की मस्जिद के पक्षमें माहौल बनाने के लिये कहानियाँ गढ़ना शुरु कर दिया था, जिससे यह आभास हो किविश्वनाथ का मन्दिर कोई विवादास्पद नही है, न ही उससे लगी हुई मस्जिद। हिन्दुओंऔर मीडिया को यह यकीन दिलाने के लिये कि औरंगजेब एक बेहद न्यायप्रिय और“सेकुलर” बादशाह था, नये-नये किस्से सुनाने की शुरुआत की गई, इन्हीं में से एक हैयह कहानी। इसके रचयिता हैं श्री बी एन पांडे (गाँधी दर्शन समिति के पूर्व अध्यक्ष औरउड़ीसा के पूर्व राज्यपाल)।
बहरहाल, औरंगजेब को “संत” और परोपकारी साबित करने की कोशिश पहले शुरु कीसैयद शहाबुद्दीन (आईएफ़एस) ने, जिन्होंने कहा कि “मन्दिर को तोड़कर मस्जिदबनाना शरीयत के खिलाफ़ है, इसलिये औरंगजेब ऐसा कर ही नहीं सकता” (कितनेभोले बलम हैं शहाबुद्दीन साहब)। फ़िर जेएनयू के स्वघोषित “सेकुलर” बुद्धिजीवी कैसेपीछे रहते? उन्होंने भी एक सुर में औरंगजेब और अकबर को महान धर्मनिरपेक्षतावादीबताने के लिये पूरा जोर लगा दिया, जबकि मुगल काल के कई दस्तावेज, डायरियाँ,ग्रन्थ आदि खुलेआम बताते हैं कि उस समय हजारों मन्दिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाईगईं। यहाँ तक कि अरुण शौरी जी ने 2 सितम्बर 1669 के मुगल अदालती दस्तावेजजिसे “मासिरी आलमगिरी” कहा जाता है, उसमें से एक अंश उद्धृत करके बताया कि“बादशाह के आदेश पर अधिकारियों ने बनारस में काशी विश्वनाथ का मन्दिर ढहाया”,और आज भी उस पुराने मन्दिर की दीवार औरंगजेब द्वारा बनाई गई मस्जिद में स्पष्टतौर पर देखी जा सकती है।
खैर, वापस आते हैं मूल कहानी की ओर… लेखक फ़रमाते हैं कि “एक बार औरंगजेबबंगाल की ओर यात्रा के दौरान लवाजमे के साथ बनारस के पास से गुजर रहा था, तबसाथ चल रहे हिन्दू राजाओं ने औरंगजेब से विनती की कि यहाँ एक दिन रुका जायेताकि रानियाँ गंगा स्नान कर सकें और विश्वनाथ के दर्शन कर सकें, औरंगजेब राजी होगया(???)। बनारस तक के पाँच मील लम्बे रास्ते पर सेना तैनात कर दी गई औरतमाम रानियाँ अपनी-अपनी पालकी में विश्वनाथ के दर्शनों के लिये निकलीं। पूजा केबाद सभी रानियाँ वापस लौट गईं सिवाय एक रानी “कच्छ की महारानी” के। महारानीकी तलाश शुरु की गई, मन्दिर की तलाशी ली गई, लेकिन कुछ नहीं मिला। औरंगजेबबहुत नाराज हुआ और उसने खुद वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मन्दिर की तलाशी ली।अन्त में उन्हें पता चला कि गणेश जी की मूर्ति के नीचे एक तहखाना बना हुआ है,जिसमें नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ उन्हें दिखाई दीं। तहखाने में जाने पर उन्हें वहाँ खोई हुईमहारानी मिलीं, जो कि बुरी तरह घबराई हुई थीं और रो रही थी, उनके गहने-जेवर आदिलूट लिये गये थे। हिन्दू राजाओं ने इसका तीव्र विरोध किया और बादशाह से कड़ीकार्रवाई करने की माँग की। तब महान औरंगजेब ने आदेश दिया कि इस अपवित्र होचुके मन्दिर को ढहा दिया जाये, विश्वनाथ की मूर्ति को और कहीं “शिफ़्ट” कर दिया जायेतथा मन्दिर के मुख्य पुजारी को गिरफ़्तार करके सजा दी जाये। इस तरह “मजबूरी” मेंऔरंगजेब को काशी विश्वनाथ का मन्दिर गिराना पड़ा… ख्यात पश्चिमी इतिहासकार डॉकोनराड एल्स्ट ने इस कहानी में छेद ही छेद ढूँढ निकाले, उन्होंने सवाल किये कि –
1) सबसे पहले तो इस बात का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है कि औरंगजेब ने इस प्रकारकी कोई यात्रा दिल्ली से बंगाल की ओर की थी। उन दिनों के तमाम मुगल दस्तावेजऔर दिन-ब-दिन की डायरियाँ आज भी मौजूद हैं और ऐसी किसी यात्रा का कोई उल्लेखकहीं नहीं मिलता, और पांडे जी ने जिस चमत्कारिक घटना का विवरण दिया है वह तोअस्तित्व में थी ही नहीं।
2) औरंगजेब कभी भी हिन्दू राजाओं या हिन्दू सैनिकों के बीच में नहीं रहा।
3) जैसा कि लिखा गया है, क्या तमाम हिन्दू राजा अपनी पत्नियों को दौरे पर साथ रखतेथे? क्या वे पिकनिक मनाने जा रहे थे?
4) सैनिकों और अंगरक्षकों से चारों तरफ़ से घिरी हुई महारानी को कैसे कोई पुजारीअगवा कर सकता है?
5) हिन्दू राजाओं ने औरंगजेब से कड़ी कार्रवाई की माँग क्यों की? क्या एक लुटेरेपुजारी(???) को सजा देने लायक ताकत भी उनमें नहीं बची थी?
6) जब मन्दिर अपवित्र(?) हो गया था, तब उसे तोड़कर नई जगह शास्त्रों और वेदों केमुताबिक मन्दिर बनाया गया, लेकिन कहाँ, किस पवित्र जगह पर?
दिमाग में सबसे पहले सवाल उठता है कि पांडे जी को औरंगजेब के बारे में यह विशेषज्ञान कहाँ से प्राप्त हुआ? खुद पांडे जी अपने लेखन में स्वीकार करते हैं कि उन्होंने इसकेबारे में डॉ पट्टाभि सीतारमैया की पुस्तक में इसका उल्लेख पढ़ा था (यानी कि खुदउन्होंने किसी मुगल दस्तावेज का अध्ययन नहीं किया था, न ही कहीं का “रेफ़रेंस” दियाथा)। औरंगजेब को महात्मा साबित करने के लिये जेएनयू के प्रोफ़ेसर के एन पणिक्करकी थ्योरी यह थी कि “काशी विश्वनाथ मन्दिर ढहाने का कारण राजनैतिक रहा होगा।उस जमाने में औरंगजेब के विरोध में सूफ़ी विद्रोहियों और मन्दिर के पंडितों के बीचसांठगांठ बन रही थी, उसे तोड़ने के लिये औरंगजेब ने मन्दिर तोड़ा” क्या गजब कीथ्योरी है, जबकि उस जमाने में काशी के पंडित गठबन्धन बनाना तो दूर “म्लेच्छों” सेबात तक नहीं करते थे।
खोजबीन करने पर पता चलता है कि पट्टाभि सीतारमैया ने यह कहानी अपनीजेलयात्रा के दौरान एक डायरी में लिखी थी, और उन्होंने यह कहानी लखनऊ के एकमुल्ला से सुनी थी। अर्थात एक मुल्ला की जबान से सुनी गई कहानी को सेकुलरवादियोंने सिर पर बिठा लिया और औरंगजेब को महान साबित करने में जुट गये, बाकी सारेदस्तावेज और कागजात सब बेकार, यहाँ तक कि “आर्कियोलॉजी विभाग” और“मासिरी आलमगिरी” जैसे आधिकारिक लेख भी बेकार।
तो अब आपको पता चल गया होगा कि अपनी गलत बात को सही साबित करने के लियेसेकुलरवादी और वामपंथी किस तरह से किस्से गढ़ते हैं, कैसे इतिहास कोतोड़ते-मरोड़ते हैं, कैसे मुगलों और उनके घटिया बादशाहों को महान और धर्मनिरपेक्षबताते हैं। एक ग्राहम स्टेंस को उड़ीसा में जलाकर मार दिया जाता है या एक जोहरा केपरिवार को बेकरी में जला दिया जाता है (यह एक क्रूर और पाशविक कृत्य था) लेकिनउस वक्त कैसे मीडिया, अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ईसाई संगठन और हमारे सदाबहार घरेलू“धर्मनिरपेक्षतावादी” जोरदार और संगठित “गिरोह” की तरह हल्ला मचाते हैं, जबकिइन्हीं लोगों और इनके साथ-साथ मानवाधिकारवादियों को कश्मीर के पंडितों की कोईचिन्ता नहीं सताती, श्रीनगर, बारामूला में उनके घर जलने पर कोई प्रतिनिधिमंडल नहींजाता, एक साजिश के तहत पंडितों के “जातीय सफ़ाये” को सतत नजर-अंदाज करदिया जाता है। असम में बांग्लादेशियों का बहुमत और हिन्दुओं का अल्पमत नजदीकही है, लेकिन इनकी असल चिंता होती है कि जेलों में आतंकियों को अच्छा खाना मिलरहा है या नहीं? सोहराबुद्दीन के मानवाधिकार सुरक्षित हैं या नहीं? अबू सलेम कीतबियत ठीक है या नहीं? फ़िलिस्तीन में क्या हो रहा है? आदि-आदि-आदि। अब समयआ गया है कि इनके घटिया कुप्रचार का मुँहतोड़ जवाब दिया जाये, कहीं ऐसा न हो किआने वाली पीढ़ी इन “बनी-बनाई” कहानियों और “अर्धसत्य” के बहकावे में आ जाये(हालांकि कॉन्वेंट स्कूलों के जरिये इतिहास को विकृत करने में वे सफ़ल हो रहे हैं),क्योंकि NDTV जैसे कई कथित “धर्मनिरपेक्ष” मीडिया भी इनके साथ है। इस बारे मेंआप क्या सोचते हैं???
जब अयोध्या आंदोलन अपने चरम पर था, उस वक्त विश्व हिन्दू परिषद ने अपने अगलेलक्ष्य तय कर लिये थे कि अब काशी और मथुरा की बारी होगी। हालांकि बाद में बनारसके व्यापारी समुदाय द्वारा अन्दरूनी विरोध (आंदोलन से धंधे को होने वाले नुकसान केआकलन के कारण) को देखते हुए परिषद ने वह “आईडिया” फ़िलहाल छोड़ दिया है।लेकिन उसी समय से “सेकुलर” और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने काशी की मस्जिद के पक्षमें माहौल बनाने के लिये कहानियाँ गढ़ना शुरु कर दिया था, जिससे यह आभास हो किविश्वनाथ का मन्दिर कोई विवादास्पद नही है, न ही उससे लगी हुई मस्जिद। हिन्दुओंऔर मीडिया को यह यकीन दिलाने के लिये कि औरंगजेब एक बेहद न्यायप्रिय और“सेकुलर” बादशाह था, नये-नये किस्से सुनाने की शुरुआत की गई, इन्हीं में से एक हैयह कहानी। इसके रचयिता हैं श्री बी एन पांडे (गाँधी दर्शन समिति के पूर्व अध्यक्ष औरउड़ीसा के पूर्व राज्यपाल)।
बहरहाल, औरंगजेब को “संत” और परोपकारी साबित करने की कोशिश पहले शुरु कीसैयद शहाबुद्दीन (आईएफ़एस) ने, जिन्होंने कहा कि “मन्दिर को तोड़कर मस्जिदबनाना शरीयत के खिलाफ़ है, इसलिये औरंगजेब ऐसा कर ही नहीं सकता” (कितनेभोले बलम हैं शहाबुद्दीन साहब)। फ़िर जेएनयू के स्वघोषित “सेकुलर” बुद्धिजीवी कैसेपीछे रहते? उन्होंने भी एक सुर में औरंगजेब और अकबर को महान धर्मनिरपेक्षतावादीबताने के लिये पूरा जोर लगा दिया, जबकि मुगल काल के कई दस्तावेज, डायरियाँ,ग्रन्थ आदि खुलेआम बताते हैं कि उस समय हजारों मन्दिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाईगईं। यहाँ तक कि अरुण शौरी जी ने 2 सितम्बर 1669 के मुगल अदालती दस्तावेजजिसे “मासिरी आलमगिरी” कहा जाता है, उसमें से एक अंश उद्धृत करके बताया कि“बादशाह के आदेश पर अधिकारियों ने बनारस में काशी विश्वनाथ का मन्दिर ढहाया”,और आज भी उस पुराने मन्दिर की दीवार औरंगजेब द्वारा बनाई गई मस्जिद में स्पष्टतौर पर देखी जा सकती है।
खैर, वापस आते हैं मूल कहानी की ओर… लेखक फ़रमाते हैं कि “एक बार औरंगजेबबंगाल की ओर यात्रा के दौरान लवाजमे के साथ बनारस के पास से गुजर रहा था, तबसाथ चल रहे हिन्दू राजाओं ने औरंगजेब से विनती की कि यहाँ एक दिन रुका जायेताकि रानियाँ गंगा स्नान कर सकें और विश्वनाथ के दर्शन कर सकें, औरंगजेब राजी होगया(???)। बनारस तक के पाँच मील लम्बे रास्ते पर सेना तैनात कर दी गई औरतमाम रानियाँ अपनी-अपनी पालकी में विश्वनाथ के दर्शनों के लिये निकलीं। पूजा केबाद सभी रानियाँ वापस लौट गईं सिवाय एक रानी “कच्छ की महारानी” के। महारानीकी तलाश शुरु की गई, मन्दिर की तलाशी ली गई, लेकिन कुछ नहीं मिला। औरंगजेबबहुत नाराज हुआ और उसने खुद वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मन्दिर की तलाशी ली।अन्त में उन्हें पता चला कि गणेश जी की मूर्ति के नीचे एक तहखाना बना हुआ है,जिसमें नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ उन्हें दिखाई दीं। तहखाने में जाने पर उन्हें वहाँ खोई हुईमहारानी मिलीं, जो कि बुरी तरह घबराई हुई थीं और रो रही थी, उनके गहने-जेवर आदिलूट लिये गये थे। हिन्दू राजाओं ने इसका तीव्र विरोध किया और बादशाह से कड़ीकार्रवाई करने की माँग की। तब महान औरंगजेब ने आदेश दिया कि इस अपवित्र होचुके मन्दिर को ढहा दिया जाये, विश्वनाथ की मूर्ति को और कहीं “शिफ़्ट” कर दिया जायेतथा मन्दिर के मुख्य पुजारी को गिरफ़्तार करके सजा दी जाये। इस तरह “मजबूरी” मेंऔरंगजेब को काशी विश्वनाथ का मन्दिर गिराना पड़ा… ख्यात पश्चिमी इतिहासकार डॉकोनराड एल्स्ट ने इस कहानी में छेद ही छेद ढूँढ निकाले, उन्होंने सवाल किये कि –
1) सबसे पहले तो इस बात का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है कि औरंगजेब ने इस प्रकारकी कोई यात्रा दिल्ली से बंगाल की ओर की थी। उन दिनों के तमाम मुगल दस्तावेजऔर दिन-ब-दिन की डायरियाँ आज भी मौजूद हैं और ऐसी किसी यात्रा का कोई उल्लेखकहीं नहीं मिलता, और पांडे जी ने जिस चमत्कारिक घटना का विवरण दिया है वह तोअस्तित्व में थी ही नहीं।
2) औरंगजेब कभी भी हिन्दू राजाओं या हिन्दू सैनिकों के बीच में नहीं रहा।
3) जैसा कि लिखा गया है, क्या तमाम हिन्दू राजा अपनी पत्नियों को दौरे पर साथ रखतेथे? क्या वे पिकनिक मनाने जा रहे थे?
4) सैनिकों और अंगरक्षकों से चारों तरफ़ से घिरी हुई महारानी को कैसे कोई पुजारीअगवा कर सकता है?
5) हिन्दू राजाओं ने औरंगजेब से कड़ी कार्रवाई की माँग क्यों की? क्या एक लुटेरेपुजारी(???) को सजा देने लायक ताकत भी उनमें नहीं बची थी?
6) जब मन्दिर अपवित्र(?) हो गया था, तब उसे तोड़कर नई जगह शास्त्रों और वेदों केमुताबिक मन्दिर बनाया गया, लेकिन कहाँ, किस पवित्र जगह पर?
दिमाग में सबसे पहले सवाल उठता है कि पांडे जी को औरंगजेब के बारे में यह विशेषज्ञान कहाँ से प्राप्त हुआ? खुद पांडे जी अपने लेखन में स्वीकार करते हैं कि उन्होंने इसकेबारे में डॉ पट्टाभि सीतारमैया की पुस्तक में इसका उल्लेख पढ़ा था (यानी कि खुदउन्होंने किसी मुगल दस्तावेज का अध्ययन नहीं किया था, न ही कहीं का “रेफ़रेंस” दियाथा)। औरंगजेब को महात्मा साबित करने के लिये जेएनयू के प्रोफ़ेसर के एन पणिक्करकी थ्योरी यह थी कि “काशी विश्वनाथ मन्दिर ढहाने का कारण राजनैतिक रहा होगा।उस जमाने में औरंगजेब के विरोध में सूफ़ी विद्रोहियों और मन्दिर के पंडितों के बीचसांठगांठ बन रही थी, उसे तोड़ने के लिये औरंगजेब ने मन्दिर तोड़ा” क्या गजब कीथ्योरी है, जबकि उस जमाने में काशी के पंडित गठबन्धन बनाना तो दूर “म्लेच्छों” सेबात तक नहीं करते थे।
खोजबीन करने पर पता चलता है कि पट्टाभि सीतारमैया ने यह कहानी अपनीजेलयात्रा के दौरान एक डायरी में लिखी थी, और उन्होंने यह कहानी लखनऊ के एकमुल्ला से सुनी थी। अर्थात एक मुल्ला की जबान से सुनी गई कहानी को सेकुलरवादियोंने सिर पर बिठा लिया और औरंगजेब को महान साबित करने में जुट गये, बाकी सारेदस्तावेज और कागजात सब बेकार, यहाँ तक कि “आर्कियोलॉजी विभाग” और“मासिरी आलमगिरी” जैसे आधिकारिक लेख भी बेकार।
तो अब आपको पता चल गया होगा कि अपनी गलत बात को सही साबित करने के लियेसेकुलरवादी और वामपंथी किस तरह से किस्से गढ़ते हैं, कैसे इतिहास कोतोड़ते-मरोड़ते हैं, कैसे मुगलों और उनके घटिया बादशाहों को महान और धर्मनिरपेक्षबताते हैं। एक ग्राहम स्टेंस को उड़ीसा में जलाकर मार दिया जाता है या एक जोहरा केपरिवार को बेकरी में जला दिया जाता है (यह एक क्रूर और पाशविक कृत्य था) लेकिनउस वक्त कैसे मीडिया, अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ईसाई संगठन और हमारे सदाबहार घरेलू“धर्मनिरपेक्षतावादी” जोरदार और संगठित “गिरोह” की तरह हल्ला मचाते हैं, जबकिइन्हीं लोगों और इनके साथ-साथ मानवाधिकारवादियों को कश्मीर के पंडितों की कोईचिन्ता नहीं सताती, श्रीनगर, बारामूला में उनके घर जलने पर कोई प्रतिनिधिमंडल नहींजाता, एक साजिश के तहत पंडितों के “जातीय सफ़ाये” को सतत नजर-अंदाज करदिया जाता है। असम में बांग्लादेशियों का बहुमत और हिन्दुओं का अल्पमत नजदीकही है, लेकिन इनकी असल चिंता होती है कि जेलों में आतंकियों को अच्छा खाना मिलरहा है या नहीं? सोहराबुद्दीन के मानवाधिकार सुरक्षित हैं या नहीं? अबू सलेम कीतबियत ठीक है या नहीं? फ़िलिस्तीन में क्या हो रहा है? आदि-आदि-आदि। अब समयआ गया है कि इनके घटिया कुप्रचार का मुँहतोड़ जवाब दिया जाये, कहीं ऐसा न हो किआने वाली पीढ़ी इन “बनी-बनाई” कहानियों और “अर्धसत्य” के बहकावे में आ जाये(हालांकि कॉन्वेंट स्कूलों के जरिये इतिहास को विकृत करने में वे सफ़ल हो रहे हैं),क्योंकि NDTV जैसे कई कथित “धर्मनिरपेक्ष” मीडिया भी इनके साथ है। इस बारे मेंआप क्या सोचते हैं???